विंडफॉल टैक्स: सरकार ने पेट्रोल से हटाया निर्यात शुल्क, डीजल और एटीएफ पर क्यों बढ़ाया गया कर?
- केंद्र सरकार ने पेट्रोल निर्यात पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी को पूरी तरह खत्म कर दिया है, जबकि डीजल पर ड्यूटी बढ़ाकर ₹11.50 प्रति लीटर और एटीएफ पर ₹11 प्रति लीटर कर दी है।
- हवाई ईंधन (एटीएफ) के निर्यात पर शुल्क में 50 पैसे प्रति लीटर का इजाफा किया गया है, जिसके बाद इसकी नई दर ₹10.50 प्रति लीटर से बढ़कर ₹11.00 प्रति लीटर पहुंच गई है।
विस्तार
वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी उथल-पुथल और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच केंद्र सरकार ने भारत की ईंधन निर्यात दरों में एक अहम बदलाव की घोषणा की है। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी नवीनतम अधिसूचना के अनुसार, पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाली स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (एसएईडी) को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।
हालांकि, इसके विपरीत सरकार ने डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) के निर्यात पर शुल्कों में बढ़ोतरी का फैसला लिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति में आई रुकावटों और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच घरेलू आपूर्ति को सुदृढ़ रखने और रिफाइनरियों के निर्यात रुझान को संतुलित करने के उद्देश्य से यह नीतिगत कदम उठाया गया है।
पेट्रोल, डीजल और एटीएफ की नई निर्यात दरों में क्या बदलाव किए गए हैं?
वित्त मंत्रालय द्वारा शनिवार को जारी अधिसूचना के तहत स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी में संशोधित दरें तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई हैं। दरों में हुए प्रमुख बदलाव इस प्रकार हैं:
- पेट्रोल निर्यात शुल्क: पेट्रोल निर्यात पर लगने वाली ड्यूटी को ₹2.50 प्रति लीटर से घटाकर शून्य कर दिया गया है, यानी अब पेट्रोल निर्यात पर कोई टैक्स नहीं लगेगा।
- डीजल निर्यात शुल्क: डीजल के निर्यात शुल्क में ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है, जिससे यह दर ₹8.50 प्रति लीटर से बढ़कर अब ₹11.50 प्रति लीटर हो गई है।
- एटीएफ निर्यात शुल्क: हवाई ईंधन (एटीएफ) के निर्यात पर शुल्क में 50 पैसे प्रति लीटर का इजाफा किया गया है, जिसके बाद इसकी नई दर ₹10.50 प्रति लीटर से बढ़कर ₹11.00 प्रति लीटर पहुंच गई है।
सरकार ने ईंधन निर्यात दरों में संशोधन का फैसला क्यों लिया?
ईंधन पर निर्यात शुल्क (विंडफॉल टैक्स) लगाने की शुरुआत मार्च के उत्तरार्ध में हुई थी, जब पश्चिम एशिया में छिड़े संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई थी और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें उच्च स्तर पर पहुंच गई थीं। उस समय सरकार का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि भारतीय रिफाइनरियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में मिल रहे ऊंचे मार्जिन के चक्कर में घरेलू बाजार की अनदेखी न करें।
संघर्ष शुरू होने से पहले भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 45% हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता था। इस प्रमुख समुद्री मार्ग पर वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही में आई बाधा के कारण भारत को अपने कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता लाने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
ईंधन निर्यात राजस्व पर इसका क्या असर पड़ा है?
पश्चिम एशिया में युद्ध के चलते कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति पर दबाव बना हुआ है, शिपिंग जोखिम बढ़े हैं और अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। इसके बावजूद, भारत सरकार ने खुदरा स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर रखकर घरेलू उपभोक्ताओं को वैश्विक झटकों से बचाए रखा है। दूसरी तरफ, निर्यात शुल्कों के माध्यम से सरकार रिफाइनरियों द्वारा विदेश भेजे जाने वाले ईंधन की मात्रा को नियंत्रित कर रही है। आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-सितंबर की अवधि के दौरान महंगे कच्चे तेल और कमजोर रुपये के कारण, कुल मात्रा में कमी के बावजूद, भारत की ईंधन निर्यात से होने वाली कमाई में लगभग 50% की जोरदार वृद्धि दर्ज की गई है।
ईंधन निर्यात दरों में यह नवीनतम संशोधन दर्शाता है कि सरकार वैश्विक ऊर्जा संकट और घरेलू बाजार की स्थिरता के बीच एक बारीक संतुलन बनाने का प्रयास कर रही है। जहां पेट्रोल से ड्यूटी हटाना निर्यातकों के लिए राहत भरा कदम है, वहीं डीजल और एटीएफ पर बढ़ी दरें घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने की रणनीति का हिस्सा हैं। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया के हालात पर सरकार की सीधी नजर रहेगी।