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हिमाचल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी : जिला जज ने बिना दिमाग लगाए सुनाया फैसला, सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज होगा

Sat, 31 Oct 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 31 Oct 2026 05:00 AM IST
सार

 हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) के एक मामले में लापरवाही से फैसला सुनाने पर एक न्यायिक अधिकारी (जिला एवं सत्र न्यायाधीश) के प्रति कड़ी नाराजगी जताई है। 

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Himachal High Court’s sharp remark: District Judge delivered a verdict without applying his mind
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) के एक मामले में लापरवाही से फैसला सुनाने पर एक न्यायिक अधिकारी (जिला एवं सत्र न्यायाधीश) के प्रति कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की अदालत ने टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारी के आदेश से स्पष्ट रूप से दिमाग का इस्तेमाल न करना झलकता है। यहां तक कि उन्हें मोटर वाहन अधिनियम के बुनियादी प्रावधानों की भी जानकारी नहीं है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह बेहद चौंकाने वाला है कि जिला न्यायपालिका के इतने वरिष्ठ स्तर पर बैठे अधिकारी बिना सोचे-समझे या यांत्रिक तरीके से आदेश पारित कर रहे हैं। जिला न्यायपालिका हमारी न्याय व्यवस्था की रीढ़ है। न्यायिक आदेशों को इस तरह मजाक नहीं बनने दिया जा सकता। हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि इस फैसले की एक प्रति संबंधित न्यायिक अधिकारी के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज की जाए। उन्हें हिमाचल प्रदेश राज्य न्यायिक अकादमी में विशेष प्रशिक्षण और रिफ्रेशर कोर्स के लिए भेजा जाए।

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यह है मामला
30 दिसंबर, 2016 को सुंदरनगर (मंडी) के पास बेही की धार में एक दुर्घटना में कार पहाड़ी से नीचे खेतों में जा गिरी थी, जिससे उसमें सवार त्रहरू उर्फ केशव की मौके पर ही मौत हो गई थी। मृतक के परिजनों ने 50 लाख रुपये के मुआवजे की मांग करते हुए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण में याचिका दायर की थी। एमएसीटी सुंदरनगर ने 16 अगस्त, 2023 को अपने फैसले में पीड़ित परिवार को 13,93,100 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। साथ ही इसकी जिम्मेदारी न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड पर डाल दी थी। इस आदेश के खिलाफ बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। हाईकोर्ट ने मामले के पूरे रिकॉर्ड की जांच की तो निचली अदालत के फैसले में गंभीर गलतियां सामने आईं। दुर्घटना 30 दिसंबर, 2016 को हुई थी, लेकिन न्यायिक अधिकारी ने फैसले में ऐसी बीमा पॉलिसी को आधार बनाया, जो सितंबर 2015 से सितंबर 2016 तक ही वैध थी।

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यानी दुर्घटना के समय यह पॉलिसी समाप्त हो चुकी थी, जबकि उस समय दूसरी बीमा पॉलिसी लागू थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दुर्घटना के समय लागू पॉलिसी केवल थर्ड पार्टी लायबिलिटी पॉलिसी थी और इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रीमियम नहीं दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुसार ऐसी एक्ट पॉलिसी में वाहन में मुफ्त या बिना किराया दिए यात्रा कर रहे यात्री का जोखिम कवर नहीं होता। इसके बावजूद निचली अदालत ने बीमा कंपनी को मुआवजा चुकाने का आदेश दे दिया था। हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील स्वीकार करते हुए उसे मुआवजे की राशि देने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया है। संशोधित आदेश के तहत अब मुआवजे की पूरी राशि और उस पर देय ब्याज का भुगतान वाहन के मालिक को स्वयं करना होगा।

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