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सुप्रीम कोर्ट: ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया पर अदालत ने फैसला रखा सुरक्षित, क्या बदलेगा जांच का तरीका?
Tue, 03 Nov 2026 08:01 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Tue, 03 Nov 2026 08:01 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने मरीज को ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया से जुड़ी याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि कुछ मरीजों को तय चिकित्सकीय मानकों के बिना ब्रेन डेड घोषित किया जा सकता है। एम्स की विशेषज्ञ समिति ने भी रिपोर्ट दी है। अब सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट ब्रेन डेथ प्रमाणन की प्रक्रिया में नए नियम और जांच के मानक तय करेगा? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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सुप्रीम कोर्ट ने एम्स की विशेषज्ञ समिति से क्या काम करने को कहा था?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
किसी मरीज को ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम कदम उठाया है। अदालत ने इस मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ अस्पतालों में मरीजों को तय चिकित्सकीय मानकों के बिना ही ब्रेन डेड घोषित किया जा सकता है। इससे अंग प्रत्यारोपण के लिए अंग निकालने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठते हैं। अदालत अब इस बात पर विचार करेगी कि ब्रेन डेथ की पुष्टि के लिए जांच और प्रमाणन की प्रक्रिया कितनी स्पष्ट और भरोसेमंद होनी चाहिए।
मंगलवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई की। याचिका डॉ. एस. गणपति ने दायर की है। उन्होंने केरल हाईकोर्ट के जून 2017 के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने कई प्रमुख बातें रखी।
ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया पर याचिकाकर्ता ने क्या सवाल उठाए?
डॉ. गणपति ने आरोप लगाया है कि गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती मरीजों को कई बार ब्रेन डेड घोषित कर दिया जाता है। उनका दावा है कि कुछ मामलों में कानून के तहत तय चिकित्सकीय मानक पूरे नहीं होते। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि अंग प्रत्यारोपण के लिए अंग निकालने के उद्देश्य से ऐसी घोषणा की जा सकती है। याचिकाकर्ता के अनुसार, ब्रेन डेथ की स्थिति में मस्तिष्क तक खून की आपूर्ति बंद हो जाती है। उन्होंने सुझाव दिया कि इसकी पुष्टि के लिए मस्तिष्क की एंजियोग्राफी और ईईजी जांच कराई जानी चाहिए। ईईजी जांच से मस्तिष्क में होने वाली विद्युत गतिविधियों का पता चलता है।
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केरल हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में क्यों चुनौती दी गई?
डॉ. गणपति ने केरल हाईकोर्ट में मरीज को ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी का मुद्दा उठाया था। हाईकोर्ट ने जून 2017 में कहा था कि वह इस मामले में आगे कार्यवाही नहीं करना चाहता। अदालत ने केंद्र और केरल सरकार की ओर से दाखिल हलफनामों पर भी ध्यान दिया था। हाईकोर्ट ने उम्मीद जताई थी कि केंद्र और राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और उचित कदम उठाएंगे। डॉ. गणपति ने इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। मंगलवार को उन्होंने खुद अदालत में पेश होकर ब्रेन डेथ प्रमाणित करने की प्रक्रिया के बारे में अपनी दलीलें रखीं।
सुप्रीम कोर्ट ने एम्स की विशेषज्ञ समिति से क्या काम करने को कहा था?
सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल को एम्स में एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया था। समिति को ब्रेन डेथ प्रमाणित करने की प्रक्रिया की जांच करनी थी। साथ ही, चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति को ध्यान में रखते हुए उचित नियम और प्रोटोकॉल सुझाने को कहा गया था। अदालत का कहना था कि इससे एक मजबूत और भरोसेमंद व्यवस्था तैयार करने में मदद मिलेगी। इससे याचिकाकर्ता की ओर से उठाई गई आशंकाओं को भी दूर किया जा सकेगा। मंगलवार की सुनवाई में केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने 2026 के राष्ट्रीय दिशानिर्देशों और एम्स की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का हवाला दिया।
ब्रेन स्टेम डेथ के प्रमाणन को लेकर अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। अब अदालत इस मामले में अपना आदेश सुनाएगी। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ब्रेन स्टेम डेथ प्रमाणन के लिए 2026 के राष्ट्रीय दिशानिर्देशों का उल्लेख किया। एम्स की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट भी अदालत के सामने रखी गई। इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि किसी मरीज को ब्रेन डेड घोषित करने से पहले कौन-सी जांच जरूरी होनी चाहिए। साथ ही, यह भी तय होना है कि प्रमाणन की प्रक्रिया में किस तरह की सावधानियां अपनाई जाएं, ताकि गलत घोषणा की आशंका न रहे।
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मंगलवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई की। याचिका डॉ. एस. गणपति ने दायर की है। उन्होंने केरल हाईकोर्ट के जून 2017 के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने कई प्रमुख बातें रखी।
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- याचिकाकर्ता ने ब्रेन डेड घोषित करने की मौजूदा प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
- केंद्र सरकार की ओर से ब्रेन स्टेम डेथ प्रमाणन के लिए 2026 के राष्ट्रीय दिशानिर्देश पेश किए गए।
- एम्स की विशेषज्ञ समिति ने भी इस मामले में अपनी रिपोर्ट दी।
- सुप्रीम कोर्ट ने सभी दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया पर याचिकाकर्ता ने क्या सवाल उठाए?
डॉ. गणपति ने आरोप लगाया है कि गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती मरीजों को कई बार ब्रेन डेड घोषित कर दिया जाता है। उनका दावा है कि कुछ मामलों में कानून के तहत तय चिकित्सकीय मानक पूरे नहीं होते। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि अंग प्रत्यारोपण के लिए अंग निकालने के उद्देश्य से ऐसी घोषणा की जा सकती है। याचिकाकर्ता के अनुसार, ब्रेन डेथ की स्थिति में मस्तिष्क तक खून की आपूर्ति बंद हो जाती है। उन्होंने सुझाव दिया कि इसकी पुष्टि के लिए मस्तिष्क की एंजियोग्राफी और ईईजी जांच कराई जानी चाहिए। ईईजी जांच से मस्तिष्क में होने वाली विद्युत गतिविधियों का पता चलता है।
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केरल हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में क्यों चुनौती दी गई?
डॉ. गणपति ने केरल हाईकोर्ट में मरीज को ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी का मुद्दा उठाया था। हाईकोर्ट ने जून 2017 में कहा था कि वह इस मामले में आगे कार्यवाही नहीं करना चाहता। अदालत ने केंद्र और केरल सरकार की ओर से दाखिल हलफनामों पर भी ध्यान दिया था। हाईकोर्ट ने उम्मीद जताई थी कि केंद्र और राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और उचित कदम उठाएंगे। डॉ. गणपति ने इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। मंगलवार को उन्होंने खुद अदालत में पेश होकर ब्रेन डेथ प्रमाणित करने की प्रक्रिया के बारे में अपनी दलीलें रखीं।
सुप्रीम कोर्ट ने एम्स की विशेषज्ञ समिति से क्या काम करने को कहा था?
सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल को एम्स में एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया था। समिति को ब्रेन डेथ प्रमाणित करने की प्रक्रिया की जांच करनी थी। साथ ही, चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति को ध्यान में रखते हुए उचित नियम और प्रोटोकॉल सुझाने को कहा गया था। अदालत का कहना था कि इससे एक मजबूत और भरोसेमंद व्यवस्था तैयार करने में मदद मिलेगी। इससे याचिकाकर्ता की ओर से उठाई गई आशंकाओं को भी दूर किया जा सकेगा। मंगलवार की सुनवाई में केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने 2026 के राष्ट्रीय दिशानिर्देशों और एम्स की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का हवाला दिया।
ब्रेन स्टेम डेथ के प्रमाणन को लेकर अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। अब अदालत इस मामले में अपना आदेश सुनाएगी। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ब्रेन स्टेम डेथ प्रमाणन के लिए 2026 के राष्ट्रीय दिशानिर्देशों का उल्लेख किया। एम्स की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट भी अदालत के सामने रखी गई। इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि किसी मरीज को ब्रेन डेड घोषित करने से पहले कौन-सी जांच जरूरी होनी चाहिए। साथ ही, यह भी तय होना है कि प्रमाणन की प्रक्रिया में किस तरह की सावधानियां अपनाई जाएं, ताकि गलत घोषणा की आशंका न रहे।