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राम मंदिर की जमीन के सर्वे की मांग: सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, 2019 के फैसले वाली भूमि की होगी जांच?
Sat, 31 Oct 2026 01:50 PM IST
प्रशांत तिवारी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Sat, 31 Oct 2026 01:50 PM IST
सार
अयोध्या में राम मंदिर की जमीन की सीमाओं की पहचान, मूल दस्तावेजों की जांच, मंदिर परिसर के रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और चढ़ावे के हिसाब-किताब का ऑडिट कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है।
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सु्प्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
अयोध्या में बने राम मंदिर की जमीन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दाखिल की गई है। इसमें मांग की गई है कि एक स्वतंत्र समिति या आयोग बनाकर यह जांच कराई जाए कि राम मंदिर ठीक उसी जमीन पर बना है या नहीं, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में अपना फैसला सुनाया था। याचिका में जमीन की सही सीमाएं तय करने, पुराने नक्शों और दस्तावेजों की जांच करने के साथ मंदिर में आने वाले चढ़ावे का हिसाब-किताब पारदर्शी बनाने की भी मांग की गई है।
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2019 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 9 नवंबर 2019 को अयोध्या जमीन विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इस फैसले में विवादित 2.77 एकड़ जमीन राम मंदिर निर्माण के लिए गठित ट्रस्ट को सौंपने का रास्ता साफ किया गया था। साथ ही, केंद्र सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में किसी प्रमुख स्थान पर पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन देने का निर्देश दिया गया था। यह फैसला सर्वसम्मति से आया था।
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जमीन की सीमाओं की जांच कराने की मांग
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि विवादित जमीन की सही पहचान और उसकी सीमाओं का स्वतंत्र सर्वे कराया जाना चाहिए। इसके लिए जमीन के नक्शे, भौगोलिक निर्देशांक, क्षेत्रफल और वास्तविक स्थिति की जांच जरूरी बताई गई है। याचिकाकर्ता चाहता है कि अदालत ऐसे विशेषज्ञों की समिति या आयोग बनाए, जिसमें जमीन का सर्वे करने वाले, राजस्व विभाग के अधिकारी और पुरातत्व सहित अन्य तकनीकी क्षेत्रों के जानकार शामिल हों। यह समिति पता लगाए कि मौजूदा मंदिर उसी जमीन पर बना है, जिसका जिक्र सुप्रीम कोर्ट के फैसले में किया गया था या नहीं।
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गड़बड़ी मिलने पर कार्रवाई की मांग
याचिका में यह भी कहा गया है कि अगर जांच के दौरान सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बताई गई जमीन और मंदिर के निर्माण वाली जमीन के बीच कोई बड़ा अंतर सामने आता है, तो उसे दूर करने के लिए उचित निर्देश दिए जाएं। याचिकाकर्ता ने संबंधित अधिकारियों और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जमीन की पहचान, सीमांकन और मंदिर निर्माण से जुड़े सभी मूल दस्तावेज, नक्शे, योजनाएं और सर्वे रिकॉर्ड सुरक्षित रखने तथा अदालत के सामने पेश करने की मांग भी की है।
चढ़ावे का हिसाब और सुविधाओं पर भी जोर
याचिका में सिर्फ जमीन की जांच की बात नहीं कही गई है। इसमें देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधाएं विकसित करने की मांग भी शामिल है। इसके अलावा मंदिर में मिलने वाले दान, चढ़ावे और रसीदों का रोजाना डिजिटल रिकॉर्ड रखने और उसका ब्योरा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि खातों का हर साल भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) से ऑडिट कराया जाए, ताकि पैसों के इस्तेमाल में पारदर्शिता बनी रहे और किसी तरह की गड़बड़ी की आशंका न रहे।
2 नवंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध याचिका
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध वाद सूची के मुताबिक, श्रीराम जन्मभूमि केस ट्रस्ट की ओर से दाखिल यह याचिका 2 नवंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ सुनवाई कर सकती है।
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बाबरी मस्जिद विध्वंस से शुरू हुआ था विवाद
अयोध्या में विवादित स्थल पर 16वीं सदी की बाबरी मस्जिद बनी हुई थी, जिसे 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने गिरा दिया था। इसके बाद देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव और दंगे हुए थे। इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2010 में विवादित 2.77 एकड़ जमीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर बांटने का फैसला दिया था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 अपीलें दाखिल हुई थीं। इन्हीं पर सुनवाई के बाद 2019 में शीर्ष अदालत ने अपना अंतिम फैसला सुनाया था। अब नई याचिका के जरिए उस फैसले में तय जमीन की पहचान और मंदिर परिसर के रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग की गई है।