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लखनऊ विवि का शोध : गामा विकिरण से सुधरेगा हाइड्रोजन गैस सेंसर का प्रदर्शन

Tue, 27 Oct 2026 03:31 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 27 Oct 2026 03:31 PM IST
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lucknow university
हाइड्रोजन गैस के रिसाव का तेजी से पता लगाने और स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों को सुरक्षित बनाने की दिशा में लखनऊ विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने महत्वपूर्ण अध्ययन किया है। भौतिक विज्ञान विभाग की सेंसर्स एंड मैटेरियल्स रिसर्च लैब में टंगस्टन ट्राइऑक्साइड (डब्ल्यूओ₃) की पतली फिल्मों पर गामा विकिरण के प्रभावों का अध्ययन कर उनकी हाइड्रोजन गैस संवेदन क्षमता को बेहतर बनाने की संभावनाएं तलाश की गई हैं। शोध के अनुसार, 100 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 75 पीपीएम हाइड्रोजन गैस के प्रति सेंसर की प्रतिक्रिया 67.94 प्रतिशत दर्ज की गई। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हाइड्रोजन एनर्जी में प्रकाशित हुआ है, जिसका इंपैक्ट फैक्टर 9.2 बताया गया है।
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डॉ. अमित कुमार वर्मा ने शोध निर्देशक डॉ. नरेंद्र कुमार पांडेय के मार्गदर्शन में यह अध्ययन किया। इसमें डब्ल्यूओ₃ की पतली फिल्मों पर 40, 80 और 120 किलो ग्रे गामा विकिरण की खुराकों के प्रभावों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने यह समझने का प्रयास किया कि विकिरण से सामग्री की संरचना और प्रकाशीय गुणों में होने वाले बदलाव उसकी गैस पहचानने की क्षमता को किस तरह प्रभावित करते हैं।
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31.5 सेकंड में सेंसर की प्रतिक्रिया
शोध के परिणामों के अनुसार, सेंसर का प्रतिक्रिया समय 31.5 सेकंड और रिकवरी समय 136.6 सेकंड दर्ज किया गया। प्रतिक्रिया समय बताता है कि गैस के संपर्क में आने पर सेंसर कितनी जल्दी संकेत देता है, जबकि रिकवरी समय गैस हटने के बाद सेंसर के संकेत के सामान्य स्थिति में लौटने से संबंधित है। अध्ययन में सामग्री के गुणों में नियंत्रित बदलाव के जरिये सेंसर के प्रदर्शन को बेहतर बनाने की संभावनाओं पर ध्यान दिया गया है।
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हाइड्रोजन ऊर्जा के सुरक्षित इस्तेमाल में मिलेगी मदद
हाइड्रोजन को स्वच्छ ऊर्जा के एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, यह अत्यधिक ज्वलनशील गैस है और हवा में इसकी सांद्रता चार से 75 प्रतिशत होने पर विस्फोटक मिश्रण बन सकता है। ऐसे में इसके उत्पादन, भंडारण और इस्तेमाल के दौरान रिसाव का समय रहते पता लगाना जरूरी है। भविष्य में इस तरह की सेंसर तकनीक हाइड्रोजन भंडारण केंद्रों, ईंधन भरने वाले स्टेशनों, प्रयोगशालाओं और औद्योगिक संयंत्रों में गैस की निगरानी के लिए उपयोगी हो सकती है।

यह शोध सामग्री विज्ञान और सेंसर तकनीक के क्षेत्र में डिफेक्ट इंजीनियरिंग यानी सामग्री के भीतर मौजूद संरचनात्मक दोषों को नियंत्रित कर उसके गुणों में बदलाव करने के दृष्टिकोण को सामने रखता है। हालांकि, व्यावहारिक इस्तेमाल से पहले सेंसर की विश्वसनीयता, लंबे समय तक स्थिरता और अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों में प्रदर्शन का परीक्षण जरूरी होगा।
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