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Lalitpur News: आगरा जेल के 2 आजीवन कैदियों की रिहाई प्रक्रिया शुरू
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ललितपुर। हत्या के अलग-अलग मामलों में आगरा जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दो कैदियों की समय से पूर्व रिहाई की प्रक्रिया शुरू हो गई है। शासन ने जिला कारागार से केस संबंधी आवश्यक दस्तावेज मांगे हैं। यह कदम अभियुक्तों की उम्र और उनके अच्छे आचरण को देखते हुए उठाया जा रहा है।
थाना बानपुर के ग्राम बूटी निवासी मथुरा प्रसाद ने 14 अप्रैल 2011 को अपने चचेरे भाई की हत्या की थी। उसे गिरफ्तार कर जिला कारागार भेजा गया, फिर दो वर्ष बाद आगरा जेल स्थानांतरित किया गया। वर्ष 2015 में कोर्ट ने मथुरा प्रसाद को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। 40-45 वर्षीय मथुरा प्रसाद तभी से आगरा जेल में निरुद्ध है। वहीं, वर्ष 2018 में कोतवाली सदर के ग्राम महर्रा में 88 वर्षीय हरप्रसाद की हत्या हुई। यह हत्या रिश्ते में समधी चतुर सिंह निवासी गंजबासौदा मध्य प्रदेश ने की थी। पुलिस ने चतुर सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेजा और वर्ष 2020 में उसे आजीवन कारावास की सजा मिली। 70 वर्षीय चतुर सिंह को वर्ष 2022 में जिला कारागार से आगरा जेल भेजा गया था।
रिहाई की प्रक्रिया
शासन ने जिला कारागार प्रशासन को पत्र जारी कर केस संबंधी आवश्यक कागज मांगे हैं। जेल प्रशासन दोनों बंदियों के निरुद्ध रहने की अवधि सहित जानकारी खंगाल रहा है। यह जानकारी शासन स्तर पर प्रेषित करने की तैयारी की जा रही है। प्रभारी जेल अधीक्षक प्रशांत उपाध्याय ने बताया कि यह प्रक्रिया शासन की फार्म-ए प्रक्रिया के तहत हो रही है। अभिलेखों के परीक्षण और निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही रिहाई पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
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कैदियों का आपराधिक इतिहास
मथुरा प्रसाद ने 14 अप्रैल 2011 को अपने चचेरे भाई की धारदार हथियार से हत्या की थी। उसे 2015 में आजीवन कारावास मिला और वह 40-45 वर्ष का है। चतुर सिंह ने 2018 में 88 वर्षीय हरप्रसाद की कुल्हाड़ी मारकर हत्या की थी। उसे 2020 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और वह 70 वर्ष का है। दोनों कैदियों का अच्छा आचरण और उनकी उम्र इस रिहाई का आधार है।
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फार्म-ए प्रकिया यह है, जिसके तहत होगी रिहाई
प्रभारी जेल अधीक्षक प्रशांत उपाध्याय के मुताबिक फार्म-ए प्रक्रिया के माध्यम से आजीवन कारावास या लंबी सजा काट चुके बंदियों को समय से पहले सशर्त रिहा किया जाता है। इसमें जेल में बंदी के अच्छे आचरण, आधी या न्यूनतम सजा पूरी करने पर समाज में पुनर्वास और जेलों में भीड़ कम करने के उद्देश्य से कैदी को छोड़ा जाता है। इसके लिए जेल प्रशासन द्वारा अच्छे आचरण वाले बंदियों को पहचान कर उससे फार्म-एक भरवाता है। इसके बाद उक्त बंदी की रिहाई की प्रक्रिया शुरू की जाती है। अंतिम निर्णय सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति और लागू नियमों के अनुसार होता है।
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थाना बानपुर के ग्राम बूटी निवासी मथुरा प्रसाद ने 14 अप्रैल 2011 को अपने चचेरे भाई की हत्या की थी। उसे गिरफ्तार कर जिला कारागार भेजा गया, फिर दो वर्ष बाद आगरा जेल स्थानांतरित किया गया। वर्ष 2015 में कोर्ट ने मथुरा प्रसाद को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। 40-45 वर्षीय मथुरा प्रसाद तभी से आगरा जेल में निरुद्ध है। वहीं, वर्ष 2018 में कोतवाली सदर के ग्राम महर्रा में 88 वर्षीय हरप्रसाद की हत्या हुई। यह हत्या रिश्ते में समधी चतुर सिंह निवासी गंजबासौदा मध्य प्रदेश ने की थी। पुलिस ने चतुर सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेजा और वर्ष 2020 में उसे आजीवन कारावास की सजा मिली। 70 वर्षीय चतुर सिंह को वर्ष 2022 में जिला कारागार से आगरा जेल भेजा गया था।
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रिहाई की प्रक्रिया
शासन ने जिला कारागार प्रशासन को पत्र जारी कर केस संबंधी आवश्यक कागज मांगे हैं। जेल प्रशासन दोनों बंदियों के निरुद्ध रहने की अवधि सहित जानकारी खंगाल रहा है। यह जानकारी शासन स्तर पर प्रेषित करने की तैयारी की जा रही है। प्रभारी जेल अधीक्षक प्रशांत उपाध्याय ने बताया कि यह प्रक्रिया शासन की फार्म-ए प्रक्रिया के तहत हो रही है। अभिलेखों के परीक्षण और निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही रिहाई पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
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कैदियों का आपराधिक इतिहास
मथुरा प्रसाद ने 14 अप्रैल 2011 को अपने चचेरे भाई की धारदार हथियार से हत्या की थी। उसे 2015 में आजीवन कारावास मिला और वह 40-45 वर्ष का है। चतुर सिंह ने 2018 में 88 वर्षीय हरप्रसाद की कुल्हाड़ी मारकर हत्या की थी। उसे 2020 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और वह 70 वर्ष का है। दोनों कैदियों का अच्छा आचरण और उनकी उम्र इस रिहाई का आधार है।
फार्म-ए प्रकिया यह है, जिसके तहत होगी रिहाई
प्रभारी जेल अधीक्षक प्रशांत उपाध्याय के मुताबिक फार्म-ए प्रक्रिया के माध्यम से आजीवन कारावास या लंबी सजा काट चुके बंदियों को समय से पहले सशर्त रिहा किया जाता है। इसमें जेल में बंदी के अच्छे आचरण, आधी या न्यूनतम सजा पूरी करने पर समाज में पुनर्वास और जेलों में भीड़ कम करने के उद्देश्य से कैदी को छोड़ा जाता है। इसके लिए जेल प्रशासन द्वारा अच्छे आचरण वाले बंदियों को पहचान कर उससे फार्म-एक भरवाता है। इसके बाद उक्त बंदी की रिहाई की प्रक्रिया शुरू की जाती है। अंतिम निर्णय सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति और लागू नियमों के अनुसार होता है।