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नैनीताल हाईकोर्ट: नाबालिग पुत्री से दुष्कर्म मामले में पिता की 20 साल की सजा रद्द, साक्ष्य के अभाव में बरी

Sat, 31 Oct 2026 11:29 PM IST
Heera अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल
अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल Published by: Heera Updated Sat, 31 Oct 2026 11:29 PM IST
सार

नैनीताल हाईकोर्ट ने नाबालिग पुत्री से दुष्कर्म के आरोप में पिता को निचली अदालत से मिली 20 साल की कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा रद्द कर दी। साक्ष्य के अभाव में अपीलकर्ता को दोषमुक्त करते हुए जुलाई 2025 के आदेश को निरस्त किया गया।

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Uttarakhand High Court quashes 20-year sentence of father in misdeed case of minor daughter
उत्तराखंड हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नैनीताल हाईकोर्ट ने पिता पर नाबालिग पुत्री के साथ दुष्कर्म करने के आरोप में निचली अदालत से मिली बीस साल की कठोर कारावास व दस हजार रूपये जुर्माने की सजा को रद्द करते हुए अपीलकर्ता को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त करते हुए निचली अदालत के जुलाई 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया है।

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कोर्ट ने आदेश में कहा कि पीड़िता के बयानों में विरोधाभास है और बिना किसी पुख्ता समर्थन के केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराना उचित नहीं है। कोर्ट ने अपीलकर्ता पिता को तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया।न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार देहरादून निवासी अपलीकर्ता प्रदीप ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर निचली अदालत देहरादून की स्पेशल पॉक्सो कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। मामला वर्ष 2022 का है। पीड़िता की मौसी द्वारा देहरादून के डोईवाला थाने में प्राथमिकी दर्ज करा कर अपीलकर्ता पर आरोप लगाया था कि 19 मार्च 2022 की शाम को पिता ने अपनी 13 वर्षीय नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म किया है।
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अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि पीड़िता बचपन से ही अपने पिता से नाराज और दूर रहती थी। प्राथमिकी दर्ज कराने वाली मौसी, चाचा, मामा और दादी सहित परिवार का कोई भी गवाह अभियोजन पक्ष के समर्थन में नहीं खड़ा हुआ है और अधिकांश गवाह पक्षद्रोही घोषित किए गए। इसके अलावा, पीड़िता के बयानों में गंभीर विसंगतियां पाई गईं।
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कोर्ट ने कहा कि कानूनन केवल पीड़िता की गवाही पर सजा दी जा सकती है, बशर्ते वह बयान संदेह से परे और पूरी तरह विश्वसनीय हो। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता अपने पिता द्वारा डांटने-रोकने की वजह से उनसे नाराज थी और एक बार घर छोड़कर भी जा चुकी थी। घटना के समय घर में दादी की गैर-मौजूदगी को लेकर पीड़िता ने एफआईआर, मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान और अदालत में अलग-अलग बातें कहीं। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट में भी आरोपी के खिलाफ कोई सीधा जैविक प्रमाण नहीं मिला था और अन्य पारिवारिक गवाहों ने भी पीड़िता के आरोपों का समर्थन नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने वाली मौसी, चाचा, चाची, मामा तथा दादी किसी ने भी अभियोजन पक्ष के आरोपों का समर्थन नहीं किया। कोर्ट ने अपीलकर्ता पिता को तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया।

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