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'जल निकायों की अनदेखी नहीं कर सकते': सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को दिया चार महीने का समय; क्या निर्देश दिए?

Sat, 24 Oct 2026 03:39 PM IST
निर्मल कांत पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Sat, 24 Oct 2026 03:39 PM IST
सार

जल निकायों को असुरक्षित छोड़ने और उनकी सीमाएं तय करने में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। नियमों के प्रकाशन के नौ साल बाद भी यह काम अधूरा है। अदालत ने राज्यों को चार महीने का समय क्यों दिया और क्या है पूरा मामला? पढ़िए इस रिपोर्ट में। 

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Courts cannot be unmindful when precious water bodies remain unprotected: SC
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मूल्यवान जल निकायों की सुरक्षा नहीं की जा रही हो, तो अदालतें इस स्थिति की अनदेखी नहीं कर सकतीं। शीर्ष कोर्ट ने सभी राज्यों और संबंधित अधिकारियों को आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) की मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति की जांच करने और उनकी सीमाएं तय करने का निर्देश दिया है।
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न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा कि जल निकाय पीने के पानी का स्रोत हैं। इसलिए वे बेहद मूल्यवान (कीमती) हैं। वे संविधान के तहत मिले जीवन के अधिकार के दायरे में आते हैं। पीठ ने कहा, यह अदालत केवल मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती और जल निकायों को असुरक्षित छोड़ने के परिणामों की अनदेखी नहीं कर सकती। 
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शीर्ष कोर्ट ने राज्यों को याद दिलाए निर्देश
इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और आर्द्रभूमि प्राधिकरणों को अपने निर्देश फिर से याद दिलाए। कोर्ट ने कहा कि यदि जल निकायों की मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति की जांच अभी तक नहीं की गई है, तो यह काम किया जाए। इसके बाद इस प्रक्रिया में अपनाए गए तरीके और कार्यप्रणाली का विवरण देते हुए अनुपालन हलफनामा दाखिल किया जाए।
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कोर्ट ने शुरुआत में कहा था कि ये हलफनामे अधिकतम चार सप्ताह के भीतर दाखिल किए जाने चाहिए। पीठ ने कहा, वरिष्ठ वकील शेखर नाफड़े ने जोरदार तरीके से दलील दी है कि अधिकारियों की ओर से मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति की जांच करना समय लेने वाला काम होगा। उन्होंने इसके लिए छह से नौ महीने का उचित समय देने की मांग की है।

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सुप्रीम कोर्ट ने चार महीने का समय क्यों दिया?
पीठ ने कहा कि वह इस काम में लगने वाले व्यापक जमीनी प्रयासों और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की जरूरत से अवगत है। पीठ ने कहा, फिर भी स्थिति को ध्यान में रखते हुए हम इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए चार महीने का समय देना उचित समझते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियमों के प्रकाशित होने की तारीख से नौ साल बीत जाने के बाद भी जल निकायों की वास्तविक स्थिति की जांच और उनकी सीमाएं तय करने का काम पूरा नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट पक्षी प्रेमी आनंद आर्य, वकील एमके बालकृष्णन और गैर-सरकारी संगठन वनशक्ति की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था। 
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