सीबीआई जांच और डीएनए टेस्ट
तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे सीबीआई को सौंपने की सिफारिश की। जुलाई 2003 में सीबीआई ने मामले में औपचारिक मुकदमा दर्ज किया। सीबीआई जांच के दौरान बच्चे और हरक सिंह रावत का डीएनए परीक्षण कराया गया। जांच रिपोर्ट में बच्चे का डीएनए हरक के डीएनए से मेल नहीं खाया। इस आधार पर अदालत और सीबीआई ने हरक को क्लीन चिट दे दी। इसके बाद मामला तब उलझ गया, जब जेनी ने अपने बयानों में बदलाव किया।
2016 में दिल्ली में दूसरी बार लगाई थी गुहार
29 जुलाई 2016 को हरक सिंह रावत के खिलाफ दुष्कर्म की प्राथमिकी दर्ज हुई। शिकायतकर्ता असम की रहने वाली महिला थी। तीन अगस्त 2016 को महिला ने अपने बयान में आरोपों से पलटते हुए हरक को क्लीन चिट दे दी। उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनके सहयोगियों पर दबाव डालकर शिकायत करवाने का आरोप लगाया। बाद में पुलिस को महिला का पता गलत मिला और उसका मोबाइल बंद था। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 2016 में शिकायतकर्ता ने खुद कहा था कि उसने 2003 में भी हरक सिंह रावत के खिलाफ शिकायत की थी। उस समय उसके बच्चे के पितृत्व का मामला उठा था। अब जेनी ने तीसरी बार न्याय की गुहार लगाई है।