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भारतीय ज्ञान प्रणाली पारंपरिक विवेक की समृद्ध विरासत : ललित
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एसपीयू के विद्यार्थियों ने स्व-चिकित्सा विषय पर कुलपति से किया संवाद
बिना सलाह दवा लेने से बचने की दी सलाह
संवाद न्यूज एजेंसी
मंडी। सरदार पटेल विश्वविद्यालय मंडी के कुलपति प्रो. ललित कुमार अवस्थी ने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली पारंपरिक विवेक और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन विश्वविद्यालय भारत की ज्ञान परंपरा के प्रमुख केंद्र रहे हैं, जहां विदेशों से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे।
बुधवार को बीएससी-एमएससी फिजिक्स इंटीग्रेटेड तृतीय सेमेस्टर की छात्राओं आयशा, स्मृति और समीक्षा ने कम्युनिटी कनेक्ट प्रोजेक्ट के तहत कुलपति का साक्षात्कार किया। इसका विषय स्व-चिकित्सा (सेल्फ मेडिकेशन) रहा। इस दौरान भौतिकी विभागाध्यक्ष एवं प्रोजेक्ट प्रभारी प्रो. राजेश कुमार शर्मा भी उपस्थित रहे।
कुलपति ने कहा कि दादी-नानी से पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलने वाले घरेलू उपचारों और रसोई में उपलब्ध प्राकृतिक सामग्रियों का पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल में विशेष महत्व रहा है। उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा और अनुसंधान से जोड़ने पर भी बल दिया।
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उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे आज भी 80 प्रतिशत आयुर्वेदिक दवाइयों का उपयोग करते हैं। साथ ही विद्यार्थियों को आगाह किया कि डॉक्टर की सलाह के बिना स्वयं दवाइयां लेना स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। उन्होंने इसकी तुलना बिना हेलमेट दोपहिया वाहन चलाने से करते हुए दवाइयों के उपयोग में चिकित्सकीय परामर्श को जरूरी बताया।
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बिना सलाह दवा लेने से बचने की दी सलाह
संवाद न्यूज एजेंसी
मंडी। सरदार पटेल विश्वविद्यालय मंडी के कुलपति प्रो. ललित कुमार अवस्थी ने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली पारंपरिक विवेक और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन विश्वविद्यालय भारत की ज्ञान परंपरा के प्रमुख केंद्र रहे हैं, जहां विदेशों से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे।
बुधवार को बीएससी-एमएससी फिजिक्स इंटीग्रेटेड तृतीय सेमेस्टर की छात्राओं आयशा, स्मृति और समीक्षा ने कम्युनिटी कनेक्ट प्रोजेक्ट के तहत कुलपति का साक्षात्कार किया। इसका विषय स्व-चिकित्सा (सेल्फ मेडिकेशन) रहा। इस दौरान भौतिकी विभागाध्यक्ष एवं प्रोजेक्ट प्रभारी प्रो. राजेश कुमार शर्मा भी उपस्थित रहे।
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कुलपति ने कहा कि दादी-नानी से पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलने वाले घरेलू उपचारों और रसोई में उपलब्ध प्राकृतिक सामग्रियों का पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल में विशेष महत्व रहा है। उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा और अनुसंधान से जोड़ने पर भी बल दिया।
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उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे आज भी 80 प्रतिशत आयुर्वेदिक दवाइयों का उपयोग करते हैं। साथ ही विद्यार्थियों को आगाह किया कि डॉक्टर की सलाह के बिना स्वयं दवाइयां लेना स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। उन्होंने इसकी तुलना बिना हेलमेट दोपहिया वाहन चलाने से करते हुए दवाइयों के उपयोग में चिकित्सकीय परामर्श को जरूरी बताया।