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Ayodhya News: जहां बरसी थी गोलियां, उन गलियों में अब रामधुन
Sun, 01 Nov 2026 11:17 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Sun, 01 Nov 2026 11:17 PM IST
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19- आचारी मंदिर का गेट तोड़ने का प्रयास करते सुरक्षा बल- फाइल फोटो-
नितिन मिश्र
अयोध्या। जिन गलियों में कभी गोलियों की तड़तड़ाहट गूंजी थी और रक्तपात हुआ था, आज वहां रामधुन की स्वर लहरियां गूंजती हैं। जिन रास्तों पर कभी कारसेवकों का खून बहा था, आज उन्हीं रास्तों से श्रद्धालुओं की रामनाम जपती टोलियां गुजरती हैं। वक्त बदल गया, अयोध्या की तस्वीर बदल गई, लेकिन दो नवंबर 1990 की वह सुबह आज भी रामनगरी की स्मृतियों में एक गहरे जख्म की तरह दर्ज है।
हनुमानगढ़ी से रामलला की ओर बढ़ रहे कारसेवकों के भजन-कीर्तन के बीच अचानक गोलियां गूंज उठी थीं। देखते ही देखते संकरी गलियां चीखों, भगदड़ और अपनों को तलाशती आंखों से भर गई थीं। दिगंबर अखाड़े के सामने हुई गोलीबारी को याद करते हुए महंत सुरेश दास बताते हैं कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवा रोकने के लिए अयोध्या की घेराबंदी कर रखी थी, लेकिन आस्था के रास्ते पर निकले कारसेवकों के कदम नहीं रुके।
दो नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा थी। कारसेवकों ने कीर्तन सत्याग्रह का निर्णय लिया था। तय हुआ कि निहत्थे कारसेवक भजन-कीर्तन करते हुए आगे बढ़ेंगे और सिर के ऊपर हाथ उठाकर तालियां बजाएंगे। इसी दौरान कुछ युवा कारसेवक आगे बढ़ने लगे। रामकुमार कोठारी ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तभी गोली चली और वह गिर पड़े। बड़े भाई को लहूलुहान देखकर 20 वर्षीय शरद कोठारी उन्हें उठाने दौड़े, लेकिन अगली गोली ने उन्हें भी जमीन पर गिरा दिया। एक ही परिवार के दो चिराग बुझ गए। आसपास मौजूद कारसेवकों के लिए यह दृश्य असहनीय था।
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मरने से पहले खून से लिखा ''सीताराम''
गोलीकांड के दौरान संकरी गलियों में भगदड़ मच गई थी। आचारी मंदिर के महंत विवेक आचारी बताते हैं कि उस समय उनकी उम्र महज 14 वर्ष थी। सुरक्षा बलों की घेराबंदी के बीच करीब 10 हजार कारसेवकों ने मंदिर में शरण ली थी। जान बचाने के लिए लोग मंदिर के भीतर छिप गए थे। सुरक्षाबलों ने मंदिर का दरवाजा तोड़ने का प्रयास भी किया, लेकिन सफल नहीं हो सके।
उस दिन का एक भयावह दृश्य याद करते हुए महंत विवेक आचारी बताते हैं कि सुरक्षाबलों की गोली लगने से एक कारसेवक जब जमीन पर गिरा तो उसने अपने खून से सड़क पर ''सीताराम'' लिख दिया। आखिर तक यह पता नहीं चल सका कि सीताराम उसका नाम था या उसने अंतिम समय में प्रभु का स्मरण करते हुए यह शब्द लिखा था।
नारों में गूंजता था मंदिर निर्माण का संकल्प
राम मंदिर आंदोलन से जुड़े शरद शर्मा बताते हैं कि वह भी 30-40 युवाओं के साथ कीर्तन करते हुए राम मंदिर की ओर निकले थे। उस समय गलियों में ''''अपना-अपना लाल चढ़ा दो, मंदिर का निर्माण करा दो'''' जैसे नारे गूंज रहे थे। चारों ओर बैरिकेडिंग की गई थी। वह अपने साथियों के साथ विवादित परिसर के पीछे प्रह्लाद घाट तक पहुंच गए थे, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
शरद शर्मा बताते हैं कि अयोध्यावासियों ने अपनी जान की परवाह किए बिना कारसेवकों के लिए भोजन-पानी का इंतजाम किया और घायलों को अस्पताल पहुंचाया। आज भी उस दौर को याद करते हुए उन चेहरों और आवाजों की स्मृतियां ताजा हो जाती हैं।
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अयोध्या। जिन गलियों में कभी गोलियों की तड़तड़ाहट गूंजी थी और रक्तपात हुआ था, आज वहां रामधुन की स्वर लहरियां गूंजती हैं। जिन रास्तों पर कभी कारसेवकों का खून बहा था, आज उन्हीं रास्तों से श्रद्धालुओं की रामनाम जपती टोलियां गुजरती हैं। वक्त बदल गया, अयोध्या की तस्वीर बदल गई, लेकिन दो नवंबर 1990 की वह सुबह आज भी रामनगरी की स्मृतियों में एक गहरे जख्म की तरह दर्ज है।
हनुमानगढ़ी से रामलला की ओर बढ़ रहे कारसेवकों के भजन-कीर्तन के बीच अचानक गोलियां गूंज उठी थीं। देखते ही देखते संकरी गलियां चीखों, भगदड़ और अपनों को तलाशती आंखों से भर गई थीं। दिगंबर अखाड़े के सामने हुई गोलीबारी को याद करते हुए महंत सुरेश दास बताते हैं कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवा रोकने के लिए अयोध्या की घेराबंदी कर रखी थी, लेकिन आस्था के रास्ते पर निकले कारसेवकों के कदम नहीं रुके।
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दो नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा थी। कारसेवकों ने कीर्तन सत्याग्रह का निर्णय लिया था। तय हुआ कि निहत्थे कारसेवक भजन-कीर्तन करते हुए आगे बढ़ेंगे और सिर के ऊपर हाथ उठाकर तालियां बजाएंगे। इसी दौरान कुछ युवा कारसेवक आगे बढ़ने लगे। रामकुमार कोठारी ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तभी गोली चली और वह गिर पड़े। बड़े भाई को लहूलुहान देखकर 20 वर्षीय शरद कोठारी उन्हें उठाने दौड़े, लेकिन अगली गोली ने उन्हें भी जमीन पर गिरा दिया। एक ही परिवार के दो चिराग बुझ गए। आसपास मौजूद कारसेवकों के लिए यह दृश्य असहनीय था।
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मरने से पहले खून से लिखा ''सीताराम''
गोलीकांड के दौरान संकरी गलियों में भगदड़ मच गई थी। आचारी मंदिर के महंत विवेक आचारी बताते हैं कि उस समय उनकी उम्र महज 14 वर्ष थी। सुरक्षा बलों की घेराबंदी के बीच करीब 10 हजार कारसेवकों ने मंदिर में शरण ली थी। जान बचाने के लिए लोग मंदिर के भीतर छिप गए थे। सुरक्षाबलों ने मंदिर का दरवाजा तोड़ने का प्रयास भी किया, लेकिन सफल नहीं हो सके।
उस दिन का एक भयावह दृश्य याद करते हुए महंत विवेक आचारी बताते हैं कि सुरक्षाबलों की गोली लगने से एक कारसेवक जब जमीन पर गिरा तो उसने अपने खून से सड़क पर ''सीताराम'' लिख दिया। आखिर तक यह पता नहीं चल सका कि सीताराम उसका नाम था या उसने अंतिम समय में प्रभु का स्मरण करते हुए यह शब्द लिखा था।
नारों में गूंजता था मंदिर निर्माण का संकल्प
राम मंदिर आंदोलन से जुड़े शरद शर्मा बताते हैं कि वह भी 30-40 युवाओं के साथ कीर्तन करते हुए राम मंदिर की ओर निकले थे। उस समय गलियों में ''''अपना-अपना लाल चढ़ा दो, मंदिर का निर्माण करा दो'''' जैसे नारे गूंज रहे थे। चारों ओर बैरिकेडिंग की गई थी। वह अपने साथियों के साथ विवादित परिसर के पीछे प्रह्लाद घाट तक पहुंच गए थे, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
शरद शर्मा बताते हैं कि अयोध्यावासियों ने अपनी जान की परवाह किए बिना कारसेवकों के लिए भोजन-पानी का इंतजाम किया और घायलों को अस्पताल पहुंचाया। आज भी उस दौर को याद करते हुए उन चेहरों और आवाजों की स्मृतियां ताजा हो जाती हैं।