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Shamli News: शामली में तैयार दीयों की पंजाब-हरियाणा तक धूम
Thu, 29 Oct 2026 01:40 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
Updated Thu, 29 Oct 2026 01:40 AM IST
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कुड़ाना में दिवाली के लिए दीये बनाते कारीगर। संवाद
- फोटो : ARchive
शामली। दीपावली पर घर-आंगन को रोशन करने वाले मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ने लगी है। बनत, कुड़ाना, शामली में तैयार होने वाले दीये और करवे पंजाब और हरियाणा तक पहुंच रहे हैं।
त्योहार पर मांग को पूरा करने के लिए यहां के परिवार चार महीने पहले से ही दीये बनाने में जुट जाते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही इस कला के सहारे परिवार अपनी आजीविका चलाने के साथ पुश्तैनी हुनर को भी सहेज रहा है।
बनत निवासी कृष्णपाल बताते हैं कि उनके परिवार में मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने का काम कई पीढ़ियों से होता आ रहा है। पूर्वजों से मिले इस हुनर को परिवार के सदस्य आज भी आगे बढ़ा रहे हैं। दीपावली के लिए हजारों दीये और करवे तैयार किए जाते हैं। मिट्टी तैयार करने से लेकर दीयों को आकार देने, सुखाने और पकाने तक की प्रक्रिया में काफी मेहनत लगती है। इस काम में परिवार के सभी सदस्य सहयोग करते हैं।
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चार महीने पहले शुरू होती है तैयारी
कृष्णपाल, मनोज कुमार, राजेश के मुताबिक तैयार दीयों की आपूर्ति स्थानीय बाजारों के अलावा हरियाणा और पंजाब में भी की जाती है। समय पर मांग पूरी करने के लिए पहले से ही बड़ी संख्या में दीये तैयार रखने पड़ते हैं। त्योहार के दिनों में बिक्री बढ़ने की उम्मीद रहती है।
रोजगार के साथ परंपरा को भी सहेज रहे
कारीगर मनोहर का कहना है कि मिट्टी के दीये बनाना उनके परिवार के लिए केवल रोजगार नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली विरासत है। आधुनिक दौर में सजावटी लाइटों का चलन बढ़ा है, लेकिन दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा आज भी कायम है। अभी तक तीन लाख दीयों के ऑर्डर आ चुके हैं। हरियाणा के हिसार, रोहतक, भिवानी, पंजाब के लुधियाना में दीये सप्लाई किए जाते हैं।
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त्योहार पर मांग को पूरा करने के लिए यहां के परिवार चार महीने पहले से ही दीये बनाने में जुट जाते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही इस कला के सहारे परिवार अपनी आजीविका चलाने के साथ पुश्तैनी हुनर को भी सहेज रहा है।
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बनत निवासी कृष्णपाल बताते हैं कि उनके परिवार में मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने का काम कई पीढ़ियों से होता आ रहा है। पूर्वजों से मिले इस हुनर को परिवार के सदस्य आज भी आगे बढ़ा रहे हैं। दीपावली के लिए हजारों दीये और करवे तैयार किए जाते हैं। मिट्टी तैयार करने से लेकर दीयों को आकार देने, सुखाने और पकाने तक की प्रक्रिया में काफी मेहनत लगती है। इस काम में परिवार के सभी सदस्य सहयोग करते हैं।
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चार महीने पहले शुरू होती है तैयारी
कृष्णपाल, मनोज कुमार, राजेश के मुताबिक तैयार दीयों की आपूर्ति स्थानीय बाजारों के अलावा हरियाणा और पंजाब में भी की जाती है। समय पर मांग पूरी करने के लिए पहले से ही बड़ी संख्या में दीये तैयार रखने पड़ते हैं। त्योहार के दिनों में बिक्री बढ़ने की उम्मीद रहती है।
रोजगार के साथ परंपरा को भी सहेज रहे
कारीगर मनोहर का कहना है कि मिट्टी के दीये बनाना उनके परिवार के लिए केवल रोजगार नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली विरासत है। आधुनिक दौर में सजावटी लाइटों का चलन बढ़ा है, लेकिन दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा आज भी कायम है। अभी तक तीन लाख दीयों के ऑर्डर आ चुके हैं। हरियाणा के हिसार, रोहतक, भिवानी, पंजाब के लुधियाना में दीये सप्लाई किए जाते हैं।