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Ahoi Ashtami 2026: माता पार्वती का स्वरूप हैं अहोई माता, जानें व्रत का महत्व और पौराणिक कथा
Sat, 31 Oct 2026 06:34 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sat, 31 Oct 2026 06:34 PM IST
सार
Ahoi Ashtami 2026: धार्मिक मान्यता है कि अहोई अष्टमी के दिन विधि-विधान से किये गए व्रत के प्रभाव से माता और संतान दोनों के जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन अहोई माता की कथा जरूर सुननी चाहिए।
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क्या है अहोई अष्टमी व्रत कथा
- फोटो : अमर उजाला AI
विस्तार
Ahoi Ashtami 2026: नारदपुराण के अनुसार सभी मासों में श्रेष्ठ कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कर्काष्टमी नामक व्रत का विधान बताया गया है। इसे लोकभाषा में अहोई आठें या अहोई अष्टमी भी कहा जाता है।
देवी पार्वती का रूप हैं अहोई
अहोई का शाब्दिक अर्थ है-अनहोनी को होनी में बदलने वाली माता।इस संपूर्ण सृष्टि में अनहोनी या दुर्भाग्य को टालने वाली आदिशक्ति देवी पार्वती हैं,इसलिए इस दिन माता पार्वती की पूजा-अर्चना अहोई माता के रूप में की जाती है।
इसलिए रखा जाता है यह व्रत
यह व्रत महिलाएं अपनी संतान की दीर्घायु,प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए रखती हैं और अहोई माता से उनके खुशहाल जीवन की प्रार्थना करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि अहोई अष्टमी के दिन विधि-विधान से किये गए व्रत के प्रभाव से माता और संतान दोनों के जीवन में सुख-समृद्धि आती है एवं उनकी कुंडली में नौ ग्रह भी अनुकूल हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिन स्त्रियों की संतान को शारीरिक कष्ट हो, स्वास्थ्य ठीक न रहता हो या बार-बार बीमार पड़ते हों अथवा किसी भी कारण से माता-पिता को अपनी संतान की ओर से चिंता बनी रहती हो, तो माता द्वारा कल्याणकारी अहोई की पूजा-अर्चना व व्रत करने से संतान को विशेष लाभ मिलता है,बच्चे कभी कष्ट में नहीं पड़ते।
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सांयकाल में पूजा है श्रेष्ठ
अहोई अष्टमी की पूजा का विधान सांयकाल प्रदोषवेला में करना श्रेष्ठ रहता है।दिनभर उपवास रखने के बाद संध्याकाल में सूर्यास्त होने के उपरांत जब आसमान में तारों का उदय हो जाए तभी पूजा आरंभ करें और रात्रि में चंद्रोदय होने पर चन्द्रमा को अर्घ्यदान करना चाहिए।
पौराणिक कथा
कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक साहूकार के सात बेटे थे।दीपावली से पूर्व साहूकार की पत्नी घर की लिपाई-पुताई के लिए मिट्टी लेने खेत में गई ओर कुदाल से मिट्टी खोदने लगी।मिट्टी खोदते समय उसकी कुदाल से अनजाने में एक पशु शावक (स्याहू के बच्चे) की मौत हो गई।इस घटना से दुखी होकर स्याहू की माता ने उस स्त्री को श्राप दे दिया। कुछ ही दिनों के पश्चात वर्ष भर में उसके सातों बेटे एक के बाद एक करके मर गए।महिला अत्यंत व्यथित रहने लगी। एक दिन उसने गांव में आए सिद्ध महात्मा को विलाप करते हुए पूरी घटना बताई। महात्मा ने कहा कि तुम उसी अष्टमी को भगवती माता की शरण लेकर स्याहू ओर उसके बच्चों का चित्र बनाकर उनकी आराधना करो और क्षमा-याचना करो।देवी माँ की कृपा से तुम्हारा पाप नष्ट हो जाएगा। साहूकार की पत्नी ने साधु की बात मानकर कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी दिन व्रत और पूजा की। व्रत के प्रभाव से उसके सातों पुत्र जीवित हो गए। तभी से महिलाएं संतान के सुख की कामना के लिए अहोई माता की पूजा करती हैं।इस कथा के माध्यम से अहिंसा और पर्यावरण की रक्षा का संदेश भी मिलता है।
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देवी पार्वती का रूप हैं अहोई
अहोई का शाब्दिक अर्थ है-अनहोनी को होनी में बदलने वाली माता।इस संपूर्ण सृष्टि में अनहोनी या दुर्भाग्य को टालने वाली आदिशक्ति देवी पार्वती हैं,इसलिए इस दिन माता पार्वती की पूजा-अर्चना अहोई माता के रूप में की जाती है।
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इसलिए रखा जाता है यह व्रत
यह व्रत महिलाएं अपनी संतान की दीर्घायु,प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए रखती हैं और अहोई माता से उनके खुशहाल जीवन की प्रार्थना करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि अहोई अष्टमी के दिन विधि-विधान से किये गए व्रत के प्रभाव से माता और संतान दोनों के जीवन में सुख-समृद्धि आती है एवं उनकी कुंडली में नौ ग्रह भी अनुकूल हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिन स्त्रियों की संतान को शारीरिक कष्ट हो, स्वास्थ्य ठीक न रहता हो या बार-बार बीमार पड़ते हों अथवा किसी भी कारण से माता-पिता को अपनी संतान की ओर से चिंता बनी रहती हो, तो माता द्वारा कल्याणकारी अहोई की पूजा-अर्चना व व्रत करने से संतान को विशेष लाभ मिलता है,बच्चे कभी कष्ट में नहीं पड़ते।
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सांयकाल में पूजा है श्रेष्ठ
अहोई अष्टमी की पूजा का विधान सांयकाल प्रदोषवेला में करना श्रेष्ठ रहता है।दिनभर उपवास रखने के बाद संध्याकाल में सूर्यास्त होने के उपरांत जब आसमान में तारों का उदय हो जाए तभी पूजा आरंभ करें और रात्रि में चंद्रोदय होने पर चन्द्रमा को अर्घ्यदान करना चाहिए।
पौराणिक कथा
कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक साहूकार के सात बेटे थे।दीपावली से पूर्व साहूकार की पत्नी घर की लिपाई-पुताई के लिए मिट्टी लेने खेत में गई ओर कुदाल से मिट्टी खोदने लगी।मिट्टी खोदते समय उसकी कुदाल से अनजाने में एक पशु शावक (स्याहू के बच्चे) की मौत हो गई।इस घटना से दुखी होकर स्याहू की माता ने उस स्त्री को श्राप दे दिया। कुछ ही दिनों के पश्चात वर्ष भर में उसके सातों बेटे एक के बाद एक करके मर गए।महिला अत्यंत व्यथित रहने लगी। एक दिन उसने गांव में आए सिद्ध महात्मा को विलाप करते हुए पूरी घटना बताई। महात्मा ने कहा कि तुम उसी अष्टमी को भगवती माता की शरण लेकर स्याहू ओर उसके बच्चों का चित्र बनाकर उनकी आराधना करो और क्षमा-याचना करो।देवी माँ की कृपा से तुम्हारा पाप नष्ट हो जाएगा। साहूकार की पत्नी ने साधु की बात मानकर कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी दिन व्रत और पूजा की। व्रत के प्रभाव से उसके सातों पुत्र जीवित हो गए। तभी से महिलाएं संतान के सुख की कामना के लिए अहोई माता की पूजा करती हैं।इस कथा के माध्यम से अहिंसा और पर्यावरण की रक्षा का संदेश भी मिलता है।